Monday, February 23, 2009

होली के रंग पिया संग

होली का दिन मेरे लिये शुभ दिन बन कर आया। उस दिन मेरे मन की एक बड़ी इच्छा पूरी हो गयी। अनिल मेरे दूर के रिश्ते में मेरा चाचा ही लगता था उन दिनों वो भी आया हुआ था। मुझे अनिल बहुत अच्छा लगता था। मुझे ऐसा लगता था कि हाय ! कभी मैं उसके साथ चुदाई करूं। पर ऐसा मौका कभी नही मिला। मै उस पर दिल से मरती थी। होली उसे हमारे साथ ही खेलना था। चाचा और चाची उसके आने से बहुत खुश थे। अनिल उम्र में मुझसे दो साल छोटा था। अनिल १९ साल का रहा होगा। शाम को होली जलने वाली थी.... चाचा ने होली के बाद की रस्में पूरी की और अपनी रात की शिफ़्ट में काम करने को चले गये....

रात को अचानक मेरी नींद खुल गयी। मैने करवट ली और फिर से आंखे बन्द कर ली। मुझे लगा कि कोई बात कर रहा है। चाची के कमरे से आवाज आ रही थी। चाचा तो थे नहीं....फिर किस से बात हो रही थी। मेरी उत्सुकता बढ गयी। मै बिस्तर से उतरी और चाचा के कमरे के दरवाजे के छेद पर आंख लगा दी। सामने अनिल खड़ा था। मैने समय देखा रात के लगभग १२ बज रहे थे। इतनी रात को ....? अभी तक सोये नहीं थे। मैं स्टूल धीरे से दरवाजे के पास रख कर आराम से बैठ गई.... मुझे लगा कि आज तक तो चाचा चाची की चुदाई देखती थी .... शायद आज कुछ और नजारा दिख जाये....

मैने बड़े आराम से छेद पर आंख लगा दी। अनिल पहले तो चाची से बात करता रहा.... फिर उसने चाची के ब्लाऊज़ पर ऊपर से ही हाथ फ़ेरा। चाची ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी चूंचियों पर दबा दिया। मेरे शरीर पर चींटियां रेंगने लगी.... तो अनिल भी चाची के साथ मजे करता है.... चाची का नाम नीता है....। नीता ने अपना एक हाथ बढा कर उसका लन्ड पकड़ लिया .... उनका कार्यक्रम शुरु हो चुका था.... मेरी चूत भी गरम होने लगी.... मैने अपनी चूंचियां दबा ली.... और देखती रही.... न जाने कब मेरी उंगली मेरे चूत में घुस गयी.... और अन्दर बाहर होने लगी.... अनिल चाची को खूब मजे से चोद रहा था। चाची अपना होली का त्योहार बड़े आनन्द से मना रही थी.... कभी में अपने बोबे भींचती कभी चूत को उंगली से चोदती........ मेरे मुख से भी कभी कभी आह निकल जाती.... सिसकारियां फ़ूट पड़ती.... अचानक में झड़ गयी.... मैने अपनी चूत दबा ली.... और आकर बिस्तर पर लेट गयी .... पर नींद कहां थी.... आवाज़ें अभी भी आ रही थी.... मैने फिर से उठ कर देखा तो अब गान्ड चुदाई हो रही थी.... मैं फिर तरावट में आने लगी .... मेरी फ़ुद्दी फिर फ़ुदक उठी.... हाय।.... मैने अपनी चूत को दबाया और मन कड़ा करके बिस्तर पर आ गई।

कुछ ही देर में चाची के कमरे से आवाजें आनी बन्द हो गयी .... मैं सोने की कोशिश करने लगी.... सवेरे उठते ही देखा कि सभी सो रहे थे। अनिल भी अपने कमरे में सो रहा था। मैने जल्दी से चाय बनाई.... पहले अनिल को उठा कर चाय दी फिर चाची यानी नीता को चाय दी। नीता ने सुस्ताते हुये कहा," नेहा इधर बैठ ........तुझसे कुछ पूछना है...."

"हाऽ.... आन्टी.... कहो...."

"एक बहुत पर्सनल सवाल है .... अनिल के बारे में...." नीता ने कहा। मैं एकदम से सहम कर नीता को देखने लगी।

"अनिल के बारे में.... हां ........ क्या ?"

"अनिल तुम्हारे बारे में कल पूछ रहा था .... क्या तुम्हें वो अच्छा लगता है...." मैं एकदम से झेंप गई।

"आन्टी .... हां अच्छा है .... पर ऐसा क्यू पूछा...."

"कल तुम रात को हमें उस छेद से देख रही थी ना....।" नीता ने तिरछी नजर से मुझे मुसकरा कर पूछा....

"ना....नहीं तो.... वो....तो...." एकदम से सीधा वार हुआ।

"हम दोनों को पता है........तुम देख रही थी.... पर हमने तुम्हें देखने दिया ...." नीता ने मतलबी निगाहों से मुझे मुस्करा कर देखा।

"आन्टी .... सोरी.... अब नहीं होगा...."

"अनिल तुम्हारे साथ रात वाला काम करना चाहता है .... बोलो है इच्छा...."

"आन्टी .... सच .... " मैने शरमा कर नीता की गोदी में अपना मुहं छुपा लिया "पर आन्टी मुझे शरम आयेगी ना...."

"जब दो दिल राज़ी तो वहां शरम का क्या काम.... फिर मैं हू ना...."

सुबह सुबह होली खेलने के दिन मेरे लिये अनिल क पैगाम ले कर आया.... मैने नीता के गाल पर एक प्यार का चुम्मा ले लिया। नीता मुसकरा उठी.... " नेहा.... बेस्ट ओफ़ लक ...."

"हटो आन्टी.... आप बड़ी वो है....यानी अच्छी हैं....।" मैं खुशी से फ़ूली नहीं समा रही थी.... मैने तुरन्त कपड़े बदले और होली के लिये सफ़ेद ड्रेस पहन लिया। हल्का सा मेक अप किया और इठला कर अनिल के कमरे में गई....

"चाय का कप?.... " मैने अनिल से बड़ी अदा से कहा.... अनिल मुझे देखता ही रह गया ....उसने मुझे चाय का कप थमा दिया।

मैने कहा,"आज तो होली है .... 8 बजे से हम तो होली खेलेंगे.... तैयार रहना...."

मेरी सहेलियां और नीता के मिलने वाले आने लगे थे। मिठाईयां खाई और खिलाई जा रही थी। सभी रंग में रंगे थे। मैं आज कुछ ज्यादा ही खुश थी.... क्योंकि सुबह ही मुझे चुदाई का न्योता मिल गया था.... रह रह कर मैं अनिल के पास जा कर उसे रंग लगा रही थी। अनिल भी अब शरारत करने लगा था .... वो कभी मेरा हाथ पकड़ लेता.... कभी मेरी पीठ पर धीरे से हाथ मारता। मुझे सिरहन होने लगती थी।

"नेहा.... एक काम करा दे.... ये सामान ऊपर वाले कमरे में ले चल...." नीता ने आवाज लगाई। मैं भाग कर अन्दर गई.... और सामान ले कर नीता के साथ ऊपर कमरे में आ गई।

नीता ने पूछा,"अनिल के क्या हाल है........?"

"आन्टी.... बड़ी मस्ती कर रहा है...."

"तेरी ऐसे करके.... चूंचियां दबाई कि नहीं...." नीता ने मेरी चूंची दबाते हुये कहा।

इतने में अनिल वहां आ गया.... नीता ने अनिल को देखते ही कहा,"ले नेहा.... अनिल आ गया.... अब तू चुदेगी...." फिर मेरे कान में बोली "तबियत से चुदवा लेना .... इसका लन्ड सोलिड है...."

मैं शरमा गयी....

नीता ने अनिल को कहा,"आ गये तुम .... अब ये रही नेहा ........ अब होली के मजे करो .... मैं जा रही हूं.... दरवाजा अन्दर से बन्द कर लेना........"

"चाची........मत जाओ ना .... मुझे शरम आयेगी........"

अनिल मुस्कराया.... और बोला -"अब चाची? .... मेरे साथ होली तो खेलो.... और नेहा....तुम बच कर कहां जाओगी"

कहते हुये अनिल ने मेरे चेहरे पर गुलाल लगा दी .... उसके हाथ अचानक मेरी चूंचियों पर आ गये और मेरे कुरते में अन्दर हाथ डाल कर मेरे उभारों पर गुलाल मल दिया साथ में मेरे उभारों को भी मसल डाला.... नीता ने देखा अनिल शुरु हो चुका है तो वो बाहर जाने लगी। इस हमले से मैं एकदम मस्त हो गयी। अनिल के मेरे उभारों को दबाने से मै उसे देखती रह गयी.... मुझे शरम आने लगी पर साथ ही मैने अपने उभारों को और आगे उभार दिया.... उसे चूंचियां मसलने का पूरा मौका दिया। अनिल ने मेरे बोबे हाथों में भर लिये। मैं सिसक उठी।

"सिर्फ़ तेरे बोबे ही तो मचका रहा है....अभी तो देखती जा...." नीता ने कमरे को बन्द कर दिया। अनिल ने अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया। मैं सिमट कर खड़ी हो गयी। अनिल ने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया और अपनी बाहों में भर लिया । उसके लन्ड का कड़ापन मुझे चूत के आसपास चुभने लगा था।

मैने जानकर कहा,"मेरे पीछे मत दबाना.... गुदगुदी होती है...."

"अच्छा .... कहां पर .... यहां चूतड़ों पर ...." और उसने मेरे दोनो गोल गोल चूतड़ मसल डाले। मै और शरमा कर सिमटने लगी।

"जानती हो .... शरमाने वाली लड़की को चोदने से बड़ा आता है...."

"हाय....ऐसे नहीं बोलो ना ...."

इधर अनिल ने अब मेरे कुर्ते को उतार दिया। मेरे दोनो उरोज तन कर सामने आ गये। फिर उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोल कर उसे उतार दिया और मुझे बिल्कुल नंगी कर दिया। नंगी होने से मुझे शरम आने लगी मैं नीचे बैठ गयी।

अनिल ने प्यार से मुझे उठाया और कहा,"नेहा........ तुम्हारी जगह बिस्तर पर है.... उठो...."

मैने जैसे ही नजर उठाई.... अनिल सामने नंगा खड़ा था। उसने कब खुद के कपड़े कब उतार लिये थे ये पता ही नहीं चला। मैने अपनी आंखे बन्द कर ली और अब मुझे होने वाली चुदाई नजर आने लग गयी थी। उसका लन्ड खड़ा हुआ था। मैने धीरे से उसका लन्ड पकड़ लिया। और उसकी चमड़ी ऊपर सरका दी.... उसका फूला हुआ लाल सुपाड़ा मेरे सामने था। मैने जीभ से उसे चाट लिया। अनिल कराह उठा। उसका लन्ड कड़क होता जा रहा था। मैने अब सुपाड़ा मुँह में भर लिया। और उसका लन्ड नीचे से पकड़ कर उसे ऊपर नीचे करने लगी। अनिल ने मेरे बोबे पकड़ लिये और उन्हे धीरे मसलने लगा। बोबे पर से लाल गुलाल अब हटने लगा था।

उसने लन्ड मेरे मुंह से निकालते हुए अनिल ने कहा," झुक जाओ.... घोड़ी बन जाओ.... देखो नेहा .... अब तुम चुदने वाली हो.... तैयार हो ना...."

"हाय रे.... नंगी तो हूं ना....अनिल.... " मैने कहा और शरमा गयी....

मैने बिस्तर पर अपने दोनो हाथ रख लिये और गान्ड पीछे उभार कर गान्ड की दोनों गोलाईयां उसके सामने कर दी। उसने अपना लन्ड हाथ से सहला कर मेरी गोलाईयों के बीच दरार में रख दिया। उसका लन्ड जैसे ही मेरी दरारों में लगा मुझे झुरझुरी आ गयी। अब उसका लन्ड सरक कर मेरी गान्ड के छेद पर आ टिका था। उसकी इच्छा गान्ड चोदने की थी ....

मेरी गान्ड उसके लिये पूरी तरह से तैयार थी। उसके दोनों हाथ मेरी चूंचियों पर आ कर जम गये थे। कुछ ही क्षणों में उसने मेरी चूंचियां भींचते हुये लन्ड पर जोर मारा.... फ़क से उसका मोटा सुपाड़ा छेद में घुस पड़ा। मुझे हल्का सा दर्द हुआ। पर मोटे लन्ड का प्यारा सा अहसास हुआ। मेरी गान्ड में फंसा उसका लन्ड मुझे असीम आनन्द दे रहा था....

तभी उसका एक जोरदार धक्का पड़ा.... मेरी चीख निकल गयी,"हायीईईऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ............ ओह्.... सोरी.... "

"नेहा .... देखो ये कब से तुम्हारा दीवाना है....पूरा जाने दो अन्दर इसे ....।"

"हाय अनिल........ हां जाने दो........"

मेरी गान्ड पर उसने अपना थूक टपका कर उसे और चिकना बना दिया।

"हाय मेरे राजा....थूक लगा कर चोदोगे....?"

अनिल हंस पड़ा.... और उसका लन्ड मेरी गान्ड में अन्दर बाहर सरकने लगा। मेरे सारे शरीर में उत्तेजना की लहर दौड़ पड़ी। मुझे उसके लन्ड का अन्दर बाहर जाना और रगड़ का अह्सास मस्त किये दे रहा था।

"हाय अनिल........ ये तुम्हारा लन्ड कितना प्यारा है.... कैसा सरक रहा है...."

अनिल को ये सुनते ही और मस्त हो गया और मुझे अच्छा लग रहा है ये जानकर और भी जोश में आ गया। उसका लन्ड मेरी गान्ड में अब तेजी से उतरने लगा था। मेरी गान्ड चुद कर मस्त हो रही थी । मुझे हालांकि चुदाई जैसा तेज मजा तो नहीं आ रहा था....पर मैं अनिल को यही जता रही थी कि मैं आनन्द से पागल हुई जा रही हूँ।

"हाय मेरे राजा चोद मेरी गान्ड को ........ पेल दे अपना लन्ड .... हाय क्या लन्ड है...."

अनिल मेरे आनन्द को देख कर और ही मस्त हुआ जा रहा था। अब उसने मेरी गान्ड में से अपना लन्ड निकाल लिया.... मुझे लगा कि शायद ये झड़ने वाला होगा .... उसने अपने लन्ड को मेरी चूत पर मारा.... मेरा चिकना पानी चूत में भरा था। उसका गीला लन्ड मेरी चूत के बाहर फ़िसलने लगा फिर सरकता हुआ चूत में अन्दर बढ चला। अब सच में मेरी जान निकलने की बारी थी.... तीखी मिठास के साथ मेरे चूत में उसका लन्ड अन्दर जा रहा था ............ये था असली चुदाई का मजा। मै चिहुंक उठी। मुख से मीठी सी सिसकारी निकल पड़ी।

"हाय रीऽऽऽऽऽ अनिल........मेरी चुद गई रे.... हाय घुसा दे राम........"

"नेहाऽऽऽऽऽऽ.... तुम्हारी चूत मुझे मार डालेगी मुझे........" अनिल भी कराहता हुआ बोला। उसके हाथ मेरी चूंचियो को मींज रहे थे। वो कभी मेरे चूंचक खींचता कभी जोर से मसक डालता। मै निहाल हो उठी थी। मेरी चूत में गजब की मिठास भरती जा रही थी.... मैं तेजी से सीमाएँ पार करने लगी.... लगभग मेरे मुँह से सीत्कारें निकलने लगी।

"आये हाय रे....मेरे राजा ........ चोद दे रे.... मेरी चूत तो गयी आज........ हाय मै चुद गयी...."

"मेरी रानी .... तेरी चूत की मैं आज मां चोद दूंगा .... साली को फ़ाड़ दूंगा...."

अनिल का धीरज भी छूटता जा रहा था। वो गालियों पर उतर आया था.... यानी अब सब कुछ उसके आपे से बाहर था....

"साली........रंडी.... तेरी भोसड़ी मारूं ........ मेर लन्ड हाय रे...."

"मेरे प्यारे अनिल।........ हां हां ........मेरी चूत का भोसड़ा बना दे.... लगा ....जोर से चोद्.... हाय राम्...."

"हाय मेरी छिनाल.... तेरी बहन को....तेरी मां को.... रे.... आऽऽऽह्.... सबको चोदा मारू.... मेरी नेहा........"

उसकी मीठी मीठी गालियां सुन कर मेरी चूत में जोरदार मिठास भरने लगी.... मैं चरमसीमा पर पहुंचने लगी। उसकी नन्गी बातों ने मुझे झड़ने की ओर अग्रसर कर दिया। मैं अपने आप को रोकती रही....पर असफ़ल रही........ मेरी चूत का पानी आखिर छूट ही पड़ा।

"अनिल....आय राम ....मैं तो गई .... जरा जोर से झटके मार...." उसने मेरी चूंचियां और दबाई और झटके मारने लगा.... पर हाय रे....मै अब झड़ने लगी.... मैं अपनी चूंचियां उससे छुड़ाने लगी....मेरी चूत अब बार बार लहरें मार मार कर अपना रस छोड़ रही थी। मै अब पूरी झड़ चुकी थी। मैं अब बस और नही चुदना चह्ती थी। पर उसने और जोर लगा कर लन्ड मेरी चूत में दबा दिया,"आह नेहा........ मैं गया.... आया........ निकला रे...." मैंने अपनी चूत में से उसका लन्ड तुरंत निकाल लिया।

"ओह्....नहीं....रूको....ऽभी नहीं...." पर मैने लन्ड निकाल कर उसे मुठ में ऐसा दबाया कि उसके लन्ड ने मेरे हाथ में अपना वीर्य छोड़ दिया। मैं उसके लन्ड को दूध निकालने जैसे खींच कर दुहने लगी.... उसके लन्ड से पिचकारी निकल कर मेरे हाथों को गीला कर रही थी....उसका सारा वीर्य उसके लन्ड पर मल दिया.... और अपने गीले हाथों में उसका वीर्य अपने होंठो से चाट लिया.... अनिल ने बड़े प्यार से मुझे देखा और अपने नंगे बदन से मेरा नंगा बदन चिपका लिया....हम कुछ पल ऐसे ही लिपटे खड़े रहे और प्यार करते रहे।

फिर अनिल अलग हो गया और अपने कपड़े पहनने लगा। मैने भी जल्दी से कपड़े पहन लिये। अनिल ने ज्योंही दरवाजा खोला तो नीता सामने खड़ी थी ....

"अरे नीता.... यहां कब से खड़ी हो...."

"अरे अनिल जी.... दिन को चुदाई कर रहे हो....बाहर पहरा दे रही थी...." मैं सर झुका कर चुपके से निकलने लगी।

"नेहा.... चुदवा कर शरमा रही हो .... अब इस चुदाई की हमें मिठाई तो खिला दो...." नीता बड़ी बेशरमी से बोली।

"रात को सब मिल कर खायें तो मजा आयेगा ना........" नीता और अनिल दोनो हंस पड़े.... मैने शरमा कर अपने हाथों से अपना मुँह छुपा लिया.... नीता से प्यार से मुझे चूम लिया।

होली का दिन मेरे लिये शुभ दिन बन कर आया। उस दिन मेरे मन की एक बड़ी इच्छा पूरी हो गयी। अनिल मेरे दूर के रिश्ते में मेरा चाचा ही लगता था उन दिनों वो भी आया हुआ था। मुझे अनिल बहुत अच्छा लगता था। मुझे ऐसा लगता था कि हाय ! कभी मैं उसके साथ चुदाई करूं। पर ऐसा मौका कभी नही मिला। मै उस पर दिल से मरती थी। होली उसे हमारे साथ ही खेलना था। चाचा और चाची उसके आने से बहुत खुश थे। अनिल उम्र में मुझसे दो साल छोटा था। अनिल १९ साल का रहा होगा। शाम को होली जलने वाली थी.... चाचा ने होली के बाद की रस्में पूरी की और अपनी रात की शिफ़्ट में काम करने को चले गये....

रात को अचानक मेरी नींद खुल गयी। मैने करवट ली और फिर से आंखे बन्द कर ली। मुझे लगा कि कोई बात कर रहा है। चाची के कमरे से आवाज आ रही थी। चाचा तो थे नहीं....फिर किस से बात हो रही थी। मेरी उत्सुकता बढ गयी। मै बिस्तर से उतरी और चाचा के कमरे के दरवाजे के छेद पर आंख लगा दी। सामने अनिल खड़ा था। मैने समय देखा रात के लगभग १२ बज रहे थे। इतनी रात को ....? अभी तक सोये नहीं थे। मैं स्टूल धीरे से दरवाजे के पास रख कर आराम से बैठ गई.... मुझे लगा कि आज तक तो चाचा चाची की चुदाई देखती थी .... शायद आज कुछ और नजारा दिख जाये....

मैने बड़े आराम से छेद पर आंख लगा दी। अनिल पहले तो चाची से बात करता रहा.... फिर उसने चाची के ब्लाऊज़ पर ऊपर से ही हाथ फ़ेरा। चाची ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी चूंचियों पर दबा दिया। मेरे शरीर पर चींटियां रेंगने लगी.... तो अनिल भी चाची के साथ मजे करता है.... चाची का नाम नीता है....। नीता ने अपना एक हाथ बढा कर उसका लन्ड पकड़ लिया .... उनका कार्यक्रम शुरु हो चुका था.... मेरी चूत भी गरम होने लगी.... मैने अपनी चूंचियां दबा ली.... और देखती रही.... न जाने कब मेरी उंगली मेरे चूत में घुस गयी.... और अन्दर बाहर होने लगी.... अनिल चाची को खूब मजे से चोद रहा था। चाची अपना होली का त्योहार बड़े आनन्द से मना रही थी.... कभी में अपने बोबे भींचती कभी चूत को उंगली से चोदती........ मेरे मुख से भी कभी कभी आह निकल जाती.... सिसकारियां फ़ूट पड़ती.... अचानक में झड़ गयी.... मैने अपनी चूत दबा ली.... और आकर बिस्तर पर लेट गयी .... पर नींद कहां थी.... आवाज़ें अभी भी आ रही थी.... मैने फिर से उठ कर देखा तो अब गान्ड चुदाई हो रही थी.... मैं फिर तरावट में आने लगी .... मेरी फ़ुद्दी फिर फ़ुदक उठी.... हाय।.... मैने अपनी चूत को दबाया और मन कड़ा करके बिस्तर पर आ गई।

कुछ ही देर में चाची के कमरे से आवाजें आनी बन्द हो गयी .... मैं सोने की कोशिश करने लगी.... सवेरे उठते ही देखा कि सभी सो रहे थे। अनिल भी अपने कमरे में सो रहा था। मैने जल्दी से चाय बनाई.... पहले अनिल को उठा कर चाय दी फिर चाची यानी नीता को चाय दी। नीता ने सुस्ताते हुये कहा," नेहा इधर बैठ ........तुझसे कुछ पूछना है...."

"हाऽ.... आन्टी.... कहो...."

"एक बहुत पर्सनल सवाल है .... अनिल के बारे में...." नीता ने कहा। मैं एकदम से सहम कर नीता को देखने लगी।

"अनिल के बारे में.... हां ........ क्या ?"

"अनिल तुम्हारे बारे में कल पूछ रहा था .... क्या तुम्हें वो अच्छा लगता है...." मैं एकदम से झेंप गई।

"आन्टी .... हां अच्छा है .... पर ऐसा क्यू पूछा...."

"कल तुम रात को हमें उस छेद से देख रही थी ना....।" नीता ने तिरछी नजर से मुझे मुसकरा कर पूछा....

"ना....नहीं तो.... वो....तो...." एकदम से सीधा वार हुआ।

"हम दोनों को पता है........तुम देख रही थी.... पर हमने तुम्हें देखने दिया ...." नीता ने मतलबी निगाहों से मुझे मुस्करा कर देखा।

"आन्टी .... सोरी.... अब नहीं होगा...."

"अनिल तुम्हारे साथ रात वाला काम करना चाहता है .... बोलो है इच्छा...."

"आन्टी .... सच .... " मैने शरमा कर नीता की गोदी में अपना मुहं छुपा लिया "पर आन्टी मुझे शरम आयेगी ना...."

"जब दो दिल राज़ी तो वहां शरम का क्या काम.... फिर मैं हू ना...."

सुबह सुबह होली खेलने के दिन मेरे लिये अनिल क पैगाम ले कर आया.... मैने नीता के गाल पर एक प्यार का चुम्मा ले लिया। नीता मुसकरा उठी.... " नेहा.... बेस्ट ओफ़ लक ...."

"हटो आन्टी.... आप बड़ी वो है....यानी अच्छी हैं....।" मैं खुशी से फ़ूली नहीं समा रही थी.... मैने तुरन्त कपड़े बदले और होली के लिये सफ़ेद ड्रेस पहन लिया। हल्का सा मेक अप किया और इठला कर अनिल के कमरे में गई....

"चाय का कप?.... " मैने अनिल से बड़ी अदा से कहा.... अनिल मुझे देखता ही रह गया ....उसने मुझे चाय का कप थमा दिया।

मैने कहा,"आज तो होली है .... 8 बजे से हम तो होली खेलेंगे.... तैयार रहना...."

मेरी सहेलियां और नीता के मिलने वाले आने लगे थे। मिठाईयां खाई और खिलाई जा रही थी। सभी रंग में रंगे थे। मैं आज कुछ ज्यादा ही खुश थी.... क्योंकि सुबह ही मुझे चुदाई का न्योता मिल गया था.... रह रह कर मैं अनिल के पास जा कर उसे रंग लगा रही थी। अनिल भी अब शरारत करने लगा था .... वो कभी मेरा हाथ पकड़ लेता.... कभी मेरी पीठ पर धीरे से हाथ मारता। मुझे सिरहन होने लगती थी।

"नेहा.... एक काम करा दे.... ये सामान ऊपर वाले कमरे में ले चल...." नीता ने आवाज लगाई। मैं भाग कर अन्दर गई.... और सामान ले कर नीता के साथ ऊपर कमरे में आ गई।

नीता ने पूछा,"अनिल के क्या हाल है........?"

"आन्टी.... बड़ी मस्ती कर रहा है...."

"तेरी ऐसे करके.... चूंचियां दबाई कि नहीं...." नीता ने मेरी चूंची दबाते हुये कहा।

इतने में अनिल वहां आ गया.... नीता ने अनिल को देखते ही कहा,"ले नेहा.... अनिल आ गया.... अब तू चुदेगी...." फिर मेरे कान में बोली "तबियत से चुदवा लेना .... इसका लन्ड सोलिड है...."

मैं शरमा गयी....

नीता ने अनिल को कहा,"आ गये तुम .... अब ये रही नेहा ........ अब होली के मजे करो .... मैं जा रही हूं.... दरवाजा अन्दर से बन्द कर लेना........"

"चाची........मत जाओ ना .... मुझे शरम आयेगी........"

अनिल मुस्कराया.... और बोला -"अब चाची? .... मेरे साथ होली तो खेलो.... और नेहा....तुम बच कर कहां जाओगी"

कहते हुये अनिल ने मेरे चेहरे पर गुलाल लगा दी .... उसके हाथ अचानक मेरी चूंचियों पर आ गये और मेरे कुरते में अन्दर हाथ डाल कर मेरे उभारों पर गुलाल मल दिया साथ में मेरे उभारों को भी मसल डाला.... नीता ने देखा अनिल शुरु हो चुका है तो वो बाहर जाने लगी। इस हमले से मैं एकदम मस्त हो गयी। अनिल के मेरे उभारों को दबाने से मै उसे देखती रह गयी.... मुझे शरम आने लगी पर साथ ही मैने अपने उभारों को और आगे उभार दिया.... उसे चूंचियां मसलने का पूरा मौका दिया। अनिल ने मेरे बोबे हाथों में भर लिये। मैं सिसक उठी।

"सिर्फ़ तेरे बोबे ही तो मचका रहा है....अभी तो देखती जा...." नीता ने कमरे को बन्द कर दिया। अनिल ने अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया। मैं सिमट कर खड़ी हो गयी। अनिल ने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया और अपनी बाहों में भर लिया । उसके लन्ड का कड़ापन मुझे चूत के आसपास चुभने लगा था।

मैने जानकर कहा,"मेरे पीछे मत दबाना.... गुदगुदी होती है...."

"अच्छा .... कहां पर .... यहां चूतड़ों पर ...." और उसने मेरे दोनो गोल गोल चूतड़ मसल डाले। मै और शरमा कर सिमटने लगी।

"जानती हो .... शरमाने वाली लड़की को चोदने से बड़ा आता है...."

"हाय....ऐसे नहीं बोलो ना ...."

इधर अनिल ने अब मेरे कुर्ते को उतार दिया। मेरे दोनो उरोज तन कर सामने आ गये। फिर उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोल कर उसे उतार दिया और मुझे बिल्कुल नंगी कर दिया। नंगी होने से मुझे शरम आने लगी मैं नीचे बैठ गयी।

अनिल ने प्यार से मुझे उठाया और कहा,"नेहा........ तुम्हारी जगह बिस्तर पर है.... उठो...."

मैने जैसे ही नजर उठाई.... अनिल सामने नंगा खड़ा था। उसने कब खुद के कपड़े कब उतार लिये थे ये पता ही नहीं चला। मैने अपनी आंखे बन्द कर ली और अब मुझे होने वाली चुदाई नजर आने लग गयी थी। उसका लन्ड खड़ा हुआ था। मैने धीरे से उसका लन्ड पकड़ लिया। और उसकी चमड़ी ऊपर सरका दी.... उसका फूला हुआ लाल सुपाड़ा मेरे सामने था। मैने जीभ से उसे चाट लिया। अनिल कराह उठा। उसका लन्ड कड़क होता जा रहा था। मैने अब सुपाड़ा मुँह में भर लिया। और उसका लन्ड नीचे से पकड़ कर उसे ऊपर नीचे करने लगी। अनिल ने मेरे बोबे पकड़ लिये और उन्हे धीरे मसलने लगा। बोबे पर से लाल गुलाल अब हटने लगा था।

उसने लन्ड मेरे मुंह से निकालते हुए अनिल ने कहा," झुक जाओ.... घोड़ी बन जाओ.... देखो नेहा .... अब तुम चुदने वाली हो.... तैयार हो ना...."

"हाय रे.... नंगी तो हूं ना....अनिल.... " मैने कहा और शरमा गयी....

मैने बिस्तर पर अपने दोनो हाथ रख लिये और गान्ड पीछे उभार कर गान्ड की दोनों गोलाईयां उसके सामने कर दी। उसने अपना लन्ड हाथ से सहला कर मेरी गोलाईयों के बीच दरार में रख दिया। उसका लन्ड जैसे ही मेरी दरारों में लगा मुझे झुरझुरी आ गयी। अब उसका लन्ड सरक कर मेरी गान्ड के छेद पर आ टिका था। उसकी इच्छा गान्ड चोदने की थी ....

मेरी गान्ड उसके लिये पूरी तरह से तैयार थी। उसके दोनों हाथ मेरी चूंचियों पर आ कर जम गये थे। कुछ ही क्षणों में उसने मेरी चूंचियां भींचते हुये लन्ड पर जोर मारा.... फ़क से उसका मोटा सुपाड़ा छेद में घुस पड़ा। मुझे हल्का सा दर्द हुआ। पर मोटे लन्ड का प्यारा सा अहसास हुआ। मेरी गान्ड में फंसा उसका लन्ड मुझे असीम आनन्द दे रहा था....

तभी उसका एक जोरदार धक्का पड़ा.... मेरी चीख निकल गयी,"हायीईईऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ............ ओह्.... सोरी.... "

"नेहा .... देखो ये कब से तुम्हारा दीवाना है....पूरा जाने दो अन्दर इसे ....।"

"हाय अनिल........ हां जाने दो........"

मेरी गान्ड पर उसने अपना थूक टपका कर उसे और चिकना बना दिया।

"हाय मेरे राजा....थूक लगा कर चोदोगे....?"

अनिल हंस पड़ा.... और उसका लन्ड मेरी गान्ड में अन्दर बाहर सरकने लगा। मेरे सारे शरीर में उत्तेजना की लहर दौड़ पड़ी। मुझे उसके लन्ड का अन्दर बाहर जाना और रगड़ का अह्सास मस्त किये दे रहा था।

"हाय अनिल........ ये तुम्हारा लन्ड कितना प्यारा है.... कैसा सरक रहा है...."

अनिल को ये सुनते ही और मस्त हो गया और मुझे अच्छा लग रहा है ये जानकर और भी जोश में आ गया। उसका लन्ड मेरी गान्ड में अब तेजी से उतरने लगा था। मेरी गान्ड चुद कर मस्त हो रही थी । मुझे हालांकि चुदाई जैसा तेज मजा तो नहीं आ रहा था....पर मैं अनिल को यही जता रही थी कि मैं आनन्द से पागल हुई जा रही हूँ।

"हाय मेरे राजा चोद मेरी गान्ड को ........ पेल दे अपना लन्ड .... हाय क्या लन्ड है...."

अनिल मेरे आनन्द को देख कर और ही मस्त हुआ जा रहा था। अब उसने मेरी गान्ड में से अपना लन्ड निकाल लिया.... मुझे लगा कि शायद ये झड़ने वाला होगा .... उसने अपने लन्ड को मेरी चूत पर मारा.... मेरा चिकना पानी चूत में भरा था। उसका गीला लन्ड मेरी चूत के बाहर फ़िसलने लगा फिर सरकता हुआ चूत में अन्दर बढ चला। अब सच में मेरी जान निकलने की बारी थी.... तीखी मिठास के साथ मेरे चूत में उसका लन्ड अन्दर जा रहा था ............ये था असली चुदाई का मजा। मै चिहुंक उठी। मुख से मीठी सी सिसकारी निकल पड़ी।

"हाय रीऽऽऽऽऽ अनिल........मेरी चुद गई रे.... हाय घुसा दे राम........"

"नेहाऽऽऽऽऽऽ.... तुम्हारी चूत मुझे मार डालेगी मुझे........" अनिल भी कराहता हुआ बोला। उसके हाथ मेरी चूंचियो को मींज रहे थे। वो कभी मेरे चूंचक खींचता कभी जोर से मसक डालता। मै निहाल हो उठी थी। मेरी चूत में गजब की मिठास भरती जा रही थी.... मैं तेजी से सीमाएँ पार करने लगी.... लगभग मेरे मुँह से सीत्कारें निकलने लगी।

"आये हाय रे....मेरे राजा ........ चोद दे रे.... मेरी चूत तो गयी आज........ हाय मै चुद गयी...."

"मेरी रानी .... तेरी चूत की मैं आज मां चोद दूंगा .... साली को फ़ाड़ दूंगा...."

अनिल का धीरज भी छूटता जा रहा था। वो गालियों पर उतर आया था.... यानी अब सब कुछ उसके आपे से बाहर था....

"साली........रंडी.... तेरी भोसड़ी मारूं ........ मेर लन्ड हाय रे...."

"मेरे प्यारे अनिल।........ हां हां ........मेरी चूत का भोसड़ा बना दे.... लगा ....जोर से चोद्.... हाय राम्...."

"हाय मेरी छिनाल.... तेरी बहन को....तेरी मां को.... रे.... आऽऽऽह्.... सबको चोदा मारू.... मेरी नेहा........"

उसकी मीठी मीठी गालियां सुन कर मेरी चूत में जोरदार मिठास भरने लगी.... मैं चरमसीमा पर पहुंचने लगी। उसकी नन्गी बातों ने मुझे झड़ने की ओर अग्रसर कर दिया। मैं अपने आप को रोकती रही....पर असफ़ल रही........ मेरी चूत का पानी आखिर छूट ही पड़ा।

"अनिल....आय राम ....मैं तो गई .... जरा जोर से झटके मार...." उसने मेरी चूंचियां और दबाई और झटके मारने लगा.... पर हाय रे....मै अब झड़ने लगी.... मैं अपनी चूंचियां उससे छुड़ाने लगी....मेरी चूत अब बार बार लहरें मार मार कर अपना रस छोड़ रही थी। मै अब पूरी झड़ चुकी थी। मैं अब बस और नही चुदना चह्ती थी। पर उसने और जोर लगा कर लन्ड मेरी चूत में दबा दिया,"आह नेहा........ मैं गया.... आया........ निकला रे...." मैंने अपनी चूत में से उसका लन्ड तुरंत निकाल लिया।

"ओह्....नहीं....रूको....ऽभी नहीं...." पर मैने लन्ड निकाल कर उसे मुठ में ऐसा दबाया कि उसके लन्ड ने मेरे हाथ में अपना वीर्य छोड़ दिया। मैं उसके लन्ड को दूध निकालने जैसे खींच कर दुहने लगी.... उसके लन्ड से पिचकारी निकल कर मेरे हाथों को गीला कर रही थी....उसका सारा वीर्य उसके लन्ड पर मल दिया.... और अपने गीले हाथों में उसका वीर्य अपने होंठो से चाट लिया.... अनिल ने बड़े प्यार से मुझे देखा और अपने नंगे बदन से मेरा नंगा बदन चिपका लिया....हम कुछ पल ऐसे ही लिपटे खड़े रहे और प्यार करते रहे।

फिर अनिल अलग हो गया और अपने कपड़े पहनने लगा। मैने भी जल्दी से कपड़े पहन लिये। अनिल ने ज्योंही दरवाजा खोला तो नीता सामने खड़ी थी ....

"अरे नीता.... यहां कब से खड़ी हो...."

"अरे अनिल जी.... दिन को चुदाई कर रहे हो....बाहर पहरा दे रही थी...." मैं सर झुका कर चुपके से निकलने लगी।

"नेहा.... चुदवा कर शरमा रही हो .... अब इस चुदाई की हमें मिठाई तो खिला दो...." नीता बड़ी बेशरमी से बोली।

"रात को सब मिल कर खायें तो मजा आयेगा ना........" नीता और अनिल दोनो हंस पड़े.... मैने शरमा कर अपने हाथों से अपना मुँह छुपा लिया.... नीता से प्यार से मुझे चूम लिया।

दीदी की ससुराल में स्वागत

गर्मियों की छुट्टियों में मुझे अपनी दीदी की ससुराल में जाने का मौका मिला। दो माह की छुट्टियाँ बिताने मैं दीदी की ससुराल में पहुंचे। उनका घर काफी बड़ा था लगभग १०-१२ कमरे का। उनके घर में दीदी और जीजाजी के साथ ही उनके चाचा-चाची तथा बड़े भाई और उनका परिवार रहता था। जीजाजी के बड़े भाई को हम बड़े जीजाजी कहकर बुलाते थे, वह फॉरेस्ट रेंजर थे तथा एक सप्ताह में दो तीन दिनों तक बाहर जंगल में रहते थे। उनके दो बच्चे थे उनका बड़ा बेटा मुझसे छोटा था।

बड़े जीजाजी बड़े कामुक प्रवृति के इन्सान थे हालाँकि मैं उस समय इस शब्द के बारे में नहीं जानता था। जब भी वे मुझे अकेला पाते, मेरे गाल पर चिकोटी काट देते। कुछ दिनों बाद वे मेरे गालों और ओंठों को चूमने लगे।

एक दिन जब मैं छत पर अकेला खड़ा उड़ती हुई पतंगों को देख रहा था तो वो भी छत पर आ पहुंचे। उन्होंने मुझे पकड़ कर मेरे कूल्हों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। मुझे काफी अटपटा लगा। जैसे तैसे मैं हाथ छुड़ा कर भाग आया। अब मुझे उनके सामने जाने में भी डर लगने लगा, पर वे मौका ताड़ कर मुझसे छेड़-छाड़ करते रहते। अभी तक वह मेरे कूल्हे कपडों के ऊपर से सहलाते थे एक दिन उन्होंने मेरी शोर्ट्स के अन्दर हाथ डालकर कूल्हे सहलाये। मुझे अच्छा तो लगा पर डर भी लगा। मैं उनके इरादों को कुछ कुछ समझने लगा। पर वो क्या करने वाले हैं यह मैं अब भी पूरी तरह नहीं समझ पाया था। मैं उनसे बच कर रहने लगा और उनके सामने ना आने का प्रयास करता।

एक दिन दोपहर को वह अपने कमरे में लेटे कोई किताब पढ़ रहे थे कि दीदी ने मुझे उनको पानी दे आने को कहा। मैं डरते हुए उनके कमरे में गया। उन्होंने पानी लेकर मुझे अपने पास जबरन बिठा लिया तथा मेरी जांघों पर हाथ फिराने लगे। फिर झटके से मुझे बगल में लिटा कर अपनी टांगों के बीच में दबोच लिया। थोड़ी देर तक शांत रहने के बाद वह मेरी शोर्ट्स के अन्दर हाथ डाल कर मेरी जांघ को दबाते हुए मेरे कूल्हे भी दबाने लगे। उन्होंने अपनी पैन्ट की जिप खोल कर अपना लंड मेरी शोर्ट्स के अन्दर जांघ पर रख दिया। मैं सिहर उठा। मेरी सांसे तेज तेज चलने लगी। उन्होंने तभी एक झटका देकर मुझे थोड़ा तिरछा कर दिया। अब मेरी पीठ उनकी और थी। उन्होंने मेरी शोर्ट्स को थोड़ा ऊपर कर मेरे कूल्हे जोर जोर से मसलने शुरू कर दिए तथा अपना लंड मेरे कूल्हों की फ़ांकों में टिका दिया। मैं कसमसा रहा था पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी। तभी बाहर कुछ शोर सा हुआ, वह थोड़ा अचकचाए और मैं उनकी पकड़ से भाग निकला। उनको बहुत गुस्सा आया तथा वह अगला मौका तलाशने लगे।

उन्हें अगला मौका शीघ्र ही मिल गया। पड़ोस में एक शादी थी जिसकी बारात इलाहाबाद जानी थी। वह मुझे भी जिद करके अपने साथ बारात में ले गए। सबको उन्होंने मुझे इलाहाबाद घुमाने के बहाने राजी कर लिया था। मैं किसी से कुछ कह भी नहीं सकता था। मुझे उनके साथ जाना पड़ा। बारात एक होटल में रुकी थी। उन्होंने सबसे अलग एक कमरा ले लिया। बारात लगने के तुंरत बाद ही वह मुझे लेकर होटल के कमरे में आ गए।

उस समय रात के १२ बजे थे। मुझे लेटते ही नींद आ गई। थोड़ी देर बाद मेरी नींद खुली तो मैंने पाया कि जीजाजी ने मेरी पैंट और चड्डी उतार दी है तथा वह मेरे लंड से खेल रहे हैं। मै अनजान बना लेटा रहा। उन्होंने मुझे तिरछा कर दिया तथा मेरे कूल्हे दबाने लगे। फिर उन्होंने अपनी एक उंगली मेरी गांड में डाल दी। मुझे दर्द हुआ पर मैं चुपचाप लेटा रहा। अब जीजाजी ने अपना लंड निकल कर मेरे चूतड़ों से रगड़ना शुरू कर दिया। थोड़ी देर तक वह ऐसा ही करते रहे। फिर उन्होंने अपने लंड को मेरी गांड के छेद में घुसाने की कोशिश की, पर वह नाकाम रहे। मेरी गांड का छेद काफी टाइट था। दोबारा कोशिश में भी वह अपना लंड छेद में नहीं घुसा सके।

अब उन्होंने मुझे पकड़ कर उल्टा कर दिया तथा वह मेरी टांगों को फैला कर बीच में बैठ गए। उन्होंने मेरे चूतडों की दोनों फांको को पकड़ कर फैलाया और अपना लंड एक जोर का झटका देते हुए मेरी गांड में पेल दिया। मैं दर्द से बिलबिला गया पर डर के कारण मेरी चीख भी नहीं निकली। अब उनका पूरा लंड मेरी गांड के अन्दर था और वह धीरे धीरे लंड को अन्दर बाहर कर रहे थे। शुरू में तो मुझे काफी दर्द हुआ पर बाद में मजा आने लगा। १५ -२० मिनट के बाद उन्होंने पिचकारी मेरी गांड में ही छोड़ दी और वह मेरे ऊपर से उठ कर बगल में लेट गए। मेरी गांड में लंड पेलने के कारण पेट में काफी गैस बनने लगी थी तथा मुझे लगा कि खून भी मेरी गांड से निकल रहा है, यह अहसास भी मुझे हुआ। पर में बिल्कुल अंजान बना लेटा रहा।

थोड़ी देर में जीजाजी उठे और उन्होंने रुमाल में पानी लगाकर मेरी गांड पोंछी तथा मेरे चूतड सहलाये। मुझे राहत महसूस हुई। जीजाजी का लंड शायद फिर से खड़ा हो गया था। वह फिर से मेरी टांगों के बीच में बैठ गए लेकिन इस बार उन्होंने मुझे कमर में हाथ डाल कर घोड़े जैसी की अवस्था में कर लिया।

अब मेरी गांड का छेद ज्यादा खुल गया था। उन्होंने मेरे दोनों चूतड पकड़ कर फैला दिए तथा अपना लंड एक बार फिर से मेरी गांड में पेल दिया। इस बार मैंने भी अपनी गांड मराई का मजा लिया तथा कूल्हे हिला हिला कर जीजाजी का पूरा लंड गांड के भीतर जाने दिया। जीजाजी ने पूरे जोश से मेरी गांड मारी। उस रात सुबह होने से पहले जीजाजी ने तीसरी बार मेरी गांड मारी। इस बार उन्होंने मुझे पूरी तरह से नंगा कर मेरी गांड पिलाई की

गर्मियों की छुट्टियों में मुझे अपनी दीदी की ससुराल में जाने का मौका मिला। दो माह की छुट्टियाँ बिताने मैं दीदी की ससुराल में पहुंचे। उनका घर काफी बड़ा था लगभग १०-१२ कमरे का। उनके घर में दीदी और जीजाजी के साथ ही उनके चाचा-चाची तथा बड़े भाई और उनका परिवार रहता था। जीजाजी के बड़े भाई को हम बड़े जीजाजी कहकर बुलाते थे, वह फॉरेस्ट रेंजर थे तथा एक सप्ताह में दो तीन दिनों तक बाहर जंगल में रहते थे। उनके दो बच्चे थे उनका बड़ा बेटा मुझसे छोटा था।

बड़े जीजाजी बड़े कामुक प्रवृति के इन्सान थे हालाँकि मैं उस समय इस शब्द के बारे में नहीं जानता था। जब भी वे मुझे अकेला पाते, मेरे गाल पर चिकोटी काट देते। कुछ दिनों बाद वे मेरे गालों और ओंठों को चूमने लगे।

एक दिन जब मैं छत पर अकेला खड़ा उड़ती हुई पतंगों को देख रहा था तो वो भी छत पर आ पहुंचे। उन्होंने मुझे पकड़ कर मेरे कूल्हों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। मुझे काफी अटपटा लगा। जैसे तैसे मैं हाथ छुड़ा कर भाग आया। अब मुझे उनके सामने जाने में भी डर लगने लगा, पर वे मौका ताड़ कर मुझसे छेड़-छाड़ करते रहते। अभी तक वह मेरे कूल्हे कपडों के ऊपर से सहलाते थे एक दिन उन्होंने मेरी शोर्ट्स के अन्दर हाथ डालकर कूल्हे सहलाये। मुझे अच्छा तो लगा पर डर भी लगा। मैं उनके इरादों को कुछ कुछ समझने लगा। पर वो क्या करने वाले हैं यह मैं अब भी पूरी तरह नहीं समझ पाया था। मैं उनसे बच कर रहने लगा और उनके सामने ना आने का प्रयास करता।

एक दिन दोपहर को वह अपने कमरे में लेटे कोई किताब पढ़ रहे थे कि दीदी ने मुझे उनको पानी दे आने को कहा। मैं डरते हुए उनके कमरे में गया। उन्होंने पानी लेकर मुझे अपने पास जबरन बिठा लिया तथा मेरी जांघों पर हाथ फिराने लगे। फिर झटके से मुझे बगल में लिटा कर अपनी टांगों के बीच में दबोच लिया। थोड़ी देर तक शांत रहने के बाद वह मेरी शोर्ट्स के अन्दर हाथ डाल कर मेरी जांघ को दबाते हुए मेरे कूल्हे भी दबाने लगे। उन्होंने अपनी पैन्ट की जिप खोल कर अपना लंड मेरी शोर्ट्स के अन्दर जांघ पर रख दिया। मैं सिहर उठा। मेरी सांसे तेज तेज चलने लगी। उन्होंने तभी एक झटका देकर मुझे थोड़ा तिरछा कर दिया। अब मेरी पीठ उनकी और थी। उन्होंने मेरी शोर्ट्स को थोड़ा ऊपर कर मेरे कूल्हे जोर जोर से मसलने शुरू कर दिए तथा अपना लंड मेरे कूल्हों की फ़ांकों में टिका दिया। मैं कसमसा रहा था पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी। तभी बाहर कुछ शोर सा हुआ, वह थोड़ा अचकचाए और मैं उनकी पकड़ से भाग निकला। उनको बहुत गुस्सा आया तथा वह अगला मौका तलाशने लगे।

उन्हें अगला मौका शीघ्र ही मिल गया। पड़ोस में एक शादी थी जिसकी बारात इलाहाबाद जानी थी। वह मुझे भी जिद करके अपने साथ बारात में ले गए। सबको उन्होंने मुझे इलाहाबाद घुमाने के बहाने राजी कर लिया था। मैं किसी से कुछ कह भी नहीं सकता था। मुझे उनके साथ जाना पड़ा। बारात एक होटल में रुकी थी। उन्होंने सबसे अलग एक कमरा ले लिया। बारात लगने के तुंरत बाद ही वह मुझे लेकर होटल के कमरे में आ गए।

उस समय रात के १२ बजे थे। मुझे लेटते ही नींद आ गई। थोड़ी देर बाद मेरी नींद खुली तो मैंने पाया कि जीजाजी ने मेरी पैंट और चड्डी उतार दी है तथा वह मेरे लंड से खेल रहे हैं। मै अनजान बना लेटा रहा। उन्होंने मुझे तिरछा कर दिया तथा मेरे कूल्हे दबाने लगे। फिर उन्होंने अपनी एक उंगली मेरी गांड में डाल दी। मुझे दर्द हुआ पर मैं चुपचाप लेटा रहा। अब जीजाजी ने अपना लंड निकल कर मेरे चूतड़ों से रगड़ना शुरू कर दिया। थोड़ी देर तक वह ऐसा ही करते रहे। फिर उन्होंने अपने लंड को मेरी गांड के छेद में घुसाने की कोशिश की, पर वह नाकाम रहे। मेरी गांड का छेद काफी टाइट था। दोबारा कोशिश में भी वह अपना लंड छेद में नहीं घुसा सके।

अब उन्होंने मुझे पकड़ कर उल्टा कर दिया तथा वह मेरी टांगों को फैला कर बीच में बैठ गए। उन्होंने मेरे चूतडों की दोनों फांको को पकड़ कर फैलाया और अपना लंड एक जोर का झटका देते हुए मेरी गांड में पेल दिया। मैं दर्द से बिलबिला गया पर डर के कारण मेरी चीख भी नहीं निकली। अब उनका पूरा लंड मेरी गांड के अन्दर था और वह धीरे धीरे लंड को अन्दर बाहर कर रहे थे। शुरू में तो मुझे काफी दर्द हुआ पर बाद में मजा आने लगा। १५ -२० मिनट के बाद उन्होंने पिचकारी मेरी गांड में ही छोड़ दी और वह मेरे ऊपर से उठ कर बगल में लेट गए। मेरी गांड में लंड पेलने के कारण पेट में काफी गैस बनने लगी थी तथा मुझे लगा कि खून भी मेरी गांड से निकल रहा है, यह अहसास भी मुझे हुआ। पर में बिल्कुल अंजान बना लेटा रहा।

थोड़ी देर में जीजाजी उठे और उन्होंने रुमाल में पानी लगाकर मेरी गांड पोंछी तथा मेरे चूतड सहलाये। मुझे राहत महसूस हुई। जीजाजी का लंड शायद फिर से खड़ा हो गया था। वह फिर से मेरी टांगों के बीच में बैठ गए लेकिन इस बार उन्होंने मुझे कमर में हाथ डाल कर घोड़े जैसी की अवस्था में कर लिया।

अब मेरी गांड का छेद ज्यादा खुल गया था। उन्होंने मेरे दोनों चूतड पकड़ कर फैला दिए तथा अपना लंड एक बार फिर से मेरी गांड में पेल दिया। इस बार मैंने भी अपनी गांड मराई का मजा लिया तथा कूल्हे हिला हिला कर जीजाजी का पूरा लंड गांड के भीतर जाने दिया। जीजाजी ने पूरे जोश से मेरी गांड मारी। उस रात सुबह होने से पहले जीजाजी ने तीसरी बार मेरी गांड मारी। इस बार उन्होंने मुझे पूरी तरह से नंगा कर मेरी गांड पिलाई की

बालकनी में भैया ने चोदा

मेरे पति काम के सिलसिले में ६ महीने के लिये यूएसए गये थे और मुझे घर पर छोड़ गये थे। मैं अपने मम्मी, पापा और छोटे भाई के साथ रहने लगी थी। मेरी उम्र २७ साल की थी। मेरा छोटा भाई मुन्ना मुझसे ८ साल छोटा था। अभी अभी उसको जवानी की हवा लगी थी। मै और मुन्ना एक ही कमरे में रहते और सोते थे।

एक शाम को मैं छत पर बैठी थी कि मैने देखा कि मुन्ना घर में आते ही दीवार के पास खड़ा हो कर पेशाब करने लगा। उसे यह नहीं पता था कि मुझे छत पर से सब दिखाई दे रहा है। जैसे ही उसने अपना लन्ड पेशाब करने को निकाला, मेरा दिल धक से रह गया। इतना मोटा और लम्बा लन्ड........ उसे देख कर मेरे दिल में सिरहन दौड़ गयी। पेशाब करके वो तो फिर अपनी मोबाईक उठा कर चला गया....पर मेरे दिल में एक हलचल छोड़ गया। दो महीनों से मेरी चुदाई नहीं हुई थी सो मेरा मन भटकने लग गया। ऐसे में मुन्ना का लन्ड और दिख गया.... मेरी चूत में कुलबुलाहट होने लगी। मैं बैचेन हो कर कमरे में आ गई। मुझे बस भैया का वो मोटा सा लन्ड ही बार बार नजर आ रहा था। सोच रही थी कि अगर ये मेरी चूत में गया तो मैं तो निहाल ही जाऊंगी।

मुन्ना रात को 8 बजे घर आया। उसने अपने कपड़े बदले.... वो अभी तक मेरे सामने ही कपड़े बदलता था....पर उसे क्या पता था कि आज मेरी नजरें ही बदली हुई हैं। पैन्ट उतारते ही उसका लन्ड उसकी छोटी सी अन्डरवीयर में उभरा हुआ नजर आने लगा। मुझे लगा कि उसे पकड़ कर मसल डालूं। उसने तोलिया लपेट कर अपना अन्डरवीयर उतार कर घर का सफ़ेद पजामा पहन लिया। तो मुन्ना सोते समय अन्डरवीयर नहीं पहनता है........तो सीधा सोएगा तो उसका लन्ड साफ़ उभर कर दिखेगा........धत्त.... ये क्या....सोचने लगी....।

मेरा मन चन्चल होता जा रहा था। डिनर के बाद हम कमरे में आ गये।

मैंने भी जानबूझ कर के मुन्ना के सामने ही कपड़े बदलना शुरु कर दिया पर उसका ध्यान मेरी तरफ़ नहीं था। मैने उसकी तरफ़ पीठ करके अपना ब्लाऊज और ब्रा उतार दिया। और एक हल्का सा टोप डाल लिया। मैने नीचे से पज़ामा आधा पहना और पेटीकोट उतारने लगी। मैंने जानबूझ कर पेटीकोट छोड़ दिया। पेटीकोट नीचे गिर पड़ा और मैं एकाएक नंगी हो गयी। आईने में मैंने देखा तो मुन्ना मुझे निहार रहा था। मैंने तुरन्त झुक कर पजामा ऊपर खींच लिया।

मुझे लगा कि तीर लग गया है। मैने ऐसा जताया कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। पर मुन्ना की नजरें बदल रही थी। मैं बाथरूम में गई उसके आईने में से भी मुन्ना नजर आ रहा था.... मैने वहाँ पर अपना टोप उतारा और अपनी चूंचियां ऐसे रखी कि मुन्ना उसे बाहर से आईने में देख ले। मैने अपने स्तनों के उभारों को मसलते हुए वापस टोप नीचे कर लिया। मुन्ना ने अपना लन्ड पकड़ कर जोर से दबा लिया। मैं मुस्करा उठी....।

मैं अब बाथरूम से बाहर आई तो उसकी नजरें बिल्कुल बदली हुई थी। अब हम दोनो बिस्तर पर बैठ कर टीवी देखने लगे थे.... पर मेरा ध्यान तो मुन्ना पर लगा था....और मुन्ना का ध्यान मुझ पर था। हम दोनो एक दूसरे को छूने की कोशिश कर रहे थे।

मैने शुरुआत कर दी...."क्या बात है मुन्ना.... आज तुम बैचेन से लग रहे हो....? "

"हां दीदी.... मुझे कुछ अजीब सा हो रहा है.... " उसका लन्ड खडा हुआ था.... उसने मेरी जांघो में हाथ फ़ेरा.... मुझे सिरहन सी आ गयी.... मैं उसकी हालत समझ रही थी.... दोनों के दिल में आग लग चुकी थी। मैने कुछ ऐसा हाथ चलाया कि उसके लन्ड को छूता हुआ और रगड़ता हुआ निकला। उसके लन्ड के कड़ेपन का अहसास मुझे हो गया। मुन्ना ने हिम्मत की और मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे खींच लिया। मैं जानकर उस पर लुढ़क गई.... पर झिझक के मारे वापस उठ गयी.... ।

रात के ११ बज रहे थे ....पर नीन्द कोसों दूर थी। मैं उठी और बालकनी में आ गयी। मुन्ना ने कमरे की लाईट बुझा दी....और मेरे साथ बालकनी में आ गया। सब तरफ़ अन्धेरा था.... दो मकान के आगे वाली स्ट्रीट लाईट जल रही थी। मेरे मन में वासना सुलग उठी थी। मुन्ना भी उसी आग में जल रहा था। उसका खडा हुआ लन्ड अन्धेरे में भी उठा हुआ साफ़ नजर आ रहा था। कुछ देर तो वह मेरे पास खड़ा रहा ....फिर मेरे पीछे आ गया। उसने मेरे कन्धों पर हाथ रख दिया.... मैने उसे कुछ नहीं कहा.... बस झुरझुरी सी आ गयी।

उसकी हिम्मत बढ़ी और मेरी कमर में हाथ डाल कर अपने लन्ड को मेरे चूतडों से सटा लिया।

उसके लन्ड का चूतडों पर स्पर्श पाते ही मेरे शरीर में सिरहन उठने लगी। उसका लन्ड का भारीपन और मोटा पन और साईज मेरे चूतडों पर महसूस होने लगा। मेरे पजामे में वो घुसा जा रहा था। मैने मुन्ना की तरफ़ देखा। मुन्ना ने मेरी आंखों में देखा .... मौन इशारों मे स्वीकृति मिल गयी।

मुन्ना ने अपने हाथ मेरे बोबे पर रख दिये....और दबा दिये.... मैं हाथ हटाने की असफ़ल कोशिश करने लगी....वास्तव में मैं हाथ हटाना ही नहीं चाहती थी।

"भैय्या.... हाय रे.... मत कर ना...." मैने उसकी तरफ़ धन्यवाद की निगाहों से देखा....और अपने स्तनों को दबवाने के लिये और उभार दिये.... नीचे चूतडों को और भी लन्ड पर दबा दिया।

"दीदीऽऽऽऽऽऽ........" कह कर अपने लन्ड का जोर मेरी गान्ड पर लगा दिया.... मेरे स्तन जोर से दबा दिये।

"भैय्या.... मर गयी .... हाऽऽऽय...." उसका लन्ड मेरे पज़ामे में से ही मेरी गान्ड में घुसा जा रहा था। मुन्ना ने मेरा ढीला सा पजामा पीछे से नीचे उतार दिया। मैं बालकनी को पकड़ कर झुक कर घोड़ी बनी जा रही थी। मुन्ना ने अपना पजामा भी नीचे कर लिया। अब हम दोनो नीचे से नंगे थे....मैं तो खुशी से मरी जा रही थी.... हाय मेरी गान्ड में अब मोटा सा लन्ड घुसेगा.... मैं भैया से चुद जाऊंगी.... मुन्ना ने अपना लन्ड को मेरी गान्ड पर रगड़ छेद पर दबा दिया। उसका मोटा सुपाड़ा मेरी गान्ड मे घुस पडा। मैन आनन्द से कराह उठी।

"भैय्या.... हाय मत कर ना........ ये तो अन्दर ही घुसा जा रहा है...."

"जाने दे बहना.... आज इसे जाने दे.... वर्ना मैं मर जाऊंगा.... दीदी .... प्लीज...."

मेरी सिसकारी निकल पडी.... उसका लन्ड मेरी गान्ड में प्रवेश कर चुका था। मेरे बोबे मसलने से मुझे खूब तेज उत्तेजना होने लगी थी। उसका लन्ड अब धीरे धीरे अन्दर बाहर होने लगा था उसके बलिष्ठ हाथों का कसाव मेरे शरीर पर बढता ही जा रहा था। उसका लन्ड मेरी गान्ड में जबरदस्ती रगड़ता हुआ आ जा रहा था। मुझे दर्द होने लगा था.... पर मैने कुछ कहा नहीं.... ऐसा मौका फिर कहां मिलता। शायद उसे तकलीफ़ भी हुई....उसने मेरी गान्ड पर अपना थूक लगाया.... और अब लन्ड आसानी से अन्दर बाहर फ़िसलने लगा था। हम दोनो मुड़ कर एक दूसरे की आंखो में आंखे डाल कर प्यार से देख रहे थे .... उसके होंठ मेरे होंठों को बार बार चूम रहे थे।

"नेहा दीदी.... आप कितनी अच्छी है.... हाय....मुझे कितना मजा आ रहा है...." मुन्ना मस्ती में लन्ड पेल रहा था। मेरी गान्ड में अब दर्द तो नहीं हो रहा था.... पर मेरी चूत में आग भड़कती ही जा रही थी....

"भैय्या .... अब मेरा पिछाड़ा छोड दो ना प्लीज़.... आगे भी तो आग लगी है मुन्ना...." मैने मुन्ना से विनती की। पर उसे तो पीछे गान्ड मारने मे ही मजा आ रहा था।

"भैया.... देखो मैं झड़ जाऊंगी.... प्लीज़.... अब लन्ड को चूत में घुसेड़ दो ना....।"

मुन्ना ने अपना लन्ड मेरी गान्ड से निकाल लिया और एक बार फिर से मेरे बोबे दाब कर पीछे से ही मेरी चूत मे लन्ड घुसेड़ दिया।

गली में सन्नाटा था.... बस एक दो कुत्ते नजर आ रहे थे....कोई हमें देखने वाला या टोकने वाला नहीं था । मेरी चूत एकदम गीली थी .... लन्ड फ़च की आवाज करते हुये गहराई तक उतर गया। आग से आग मिल गयी.... मन में कसक सी उठी.... और एक हूक सी उठी.... एक सिसकारी निकल पड़ी।

"चोद दे मुन्ना.... चोद दे.... अपनी बहन को चोद दे.... आज मुझे निहाल कर दे........" मैं सिसकते हुए बोली।

"हाय दीदी....इसमें इतना मजा आता है.... मुझे नहीं मालूम था.... हाय दीदी...." मुन्ना ने जोश में अब चोदना चालू कर दिया था। मुझे भी तेज मजा आने लगा था। सुख के सागर में गोते लगाने लगी.... शायद भैया के साथ ये गलत सम्बन्ध.... गलत काम .... चोरी चोरी चुदाई में एक अजीब सा आकर्षण भी था........ जो आनन्द दुगुना किये दे रहा था।

"मुन्ना.... हाय तेरा मोटा लन्ड रे.... कितना मजा आ रहा है....फ़ाड दे रे मेरी चूत...."

"दीदी रे.... हां मेरी दीदी........ खा ले तू भी आज भैया का लन्ड........ मुझे तो दीदी.... स्वर्ग का मजा दे दिया...."

उसकी चोदने की रफ़्तार बढती जा रही थी.... मुझे घोड़ी बना कर कुत्ते की तरह चोदे जा रहा था.... मेरे मन की इच्छा निकलती जा रही थी.... आज मेरा भैया मेरा सैंया बन गया.... उसका लन्ड ले कर मुझे असीम शान्ति मिल रही थी।

"अब जोर से चोद दे भैय्या .... दे लन्ड.... और जोर से लन्ड मार .... मेरी चूत पानी छोड़ रही है....ऊऊऊउईईईई.... दे ....और दे.... चोद दे मुन्ना...."

मेरी चरमसीमा आ रही थी.... मैं बेहाल हो उठी थी.... मुझे लग रहा था मुझे और चोदे.... इतना चोदे कि.... बस जिन्दगी भर चोदता ही रहे .... और और.... अति उत्तेजना से मैं स्खलित होने लगी। मैं झड़ने लगी........मैं रोकने कि कोशिश करती रही पर.... मेरा रोकना किसी काम ना आया.... बस एक बार निकलना चालू हो गया तो निकलता ही गया.... मेरा शरीर खडे खडे ऐंठता रहा.... एक एक अंग अंगड़ाई लेता हुआ रिसने लगा.... मेरा जिस्म जैसे सिमटने लगा। मैं धीरे धीरे जमीन पर आने लगी। अब सभी अंगों मे उत्तेजना समाप्त होने लगी थी। मैं मुन्ना का लन्ड निकालने की कोशिश करने लगी। पर उसका शरीर पर कसाव और पकड बहुत मजबूत थी। उसका लन्ड अब मुझे मोटा और लम्बा लगने लगा था.... लन्ड के भारीपन का अह्सास होने लगा था.... मेरी चूत में अब चोट लगने लगी थी....

"भैया....छोड़ दो अब.... हाय लग रही है........"

पर उसका मोटा लन्ड लग रहा था मेरी चूत को फ़ाड डालेगा.... ओह ओह ये क्या.... मुन्ना ने अपना लन्ड मेरी चूत में जोर से गड़ा दिया.... मैं छटपटा उठी.... तेज अन्दर दर्द हुआ.... शायद जड़ तक को चीर दिया था....

"मुन्ना छोड़....छोड़ .... हाय रे.... फ़ाड़ डालेगा क्या........"

पर वो वास्तव में झड़ रहा था.... उसके अंगों ने अन्तिम सांस ली थी....पूरा जोर लगा कर .... मेरी चूत मे अपना वीर्य छोड दिया था.... उसके लन्ड की लहरें वीर्य छोड़ती बडी मधुर लग रही थी.... अब उसका लन्ड धीरे धीरे बाहर निकलने लिये फ़िसलता जा रहा था। लगता था उसका बहुत सारा वीर्य निकला था। उसका लन्ड बाहर आते ही वीर्य मेरी चूत से बाहर टपकने लगा था। मुन्ना ने मुझे घुमा कर मुझे चिपका लिया....

"दीदी........ आज से मैं आपका गुलाम हो गया.... आपने मुझे इतना बडा सुख दिया है.... मैं क्या कहूं...."

उसके होंठ मेरे होंठो से जुड़ गये और वो मुझे पागलों की तरह प्यार करने लगा। मैने भी प्यार से उसे चूमा और अन्दर ले आई और बालकनी का दरवाजा बन्द कर दिया। अब हम दोनों बहन-भाई ना हो कर एक दूसरे के सैंयां बन गये थे। हम दोनो फिर से बिस्तर पर कूद पडे और पलंग चरमरा उठा........ हम दोनों फिर से एक दूसरे में समाने की कोशिश करने लगे। हमारे बदन में फिर से बिजली भर गई.... मेरे बोबे तन गये....मुन्ना का लन्ड फ़ड़फ़ड़ाने लगा.... और.... और.... फिर मेरे शरीर में उसका कड़ापन एक बार फिर से उतरने लगा ........ मेरी चुदाई एक बार फिर से चालू हो गई........

पतियों की अदला-बदली

मेरा नाम शैली है। मेरी उम्र २९ साल है। मैं अमेरिका के एक बड़े शहर में अपने पति के साथ रहती हूँ। अभी हम लोगों को कोई बच्चा नहीं है। मैं दिखने में खूबसूरत हूँ। वैसे तो मेरा फिगर स्लिम है लेकिन मेरे बूब्स बड़े हैं। मेरा पति रोजर, और मैं दोनों ही काम करते हैं, लेकिन अलग-अलग जगहों पर।

मेरी एक सहेली है लेस्ली, मेरी ही उम्र की, जो मेरे साथ ही काम करती है। उसका पति टॉम मेरी पति के साथ काम करता है। लेस्ली भी दिखने में बहुत खूबसूरत है। उसके हिप्स मुझसे बड़े हैं। हम चरों अक्सर सप्ताहांत पर कैम्पिंग करते हैं। महानगर की भीड़-भाड़ से दूर, शांत माहौल में किसी जंगल के किनारे या किसी बड़े पार्क में अपना कैंप डालकर हम अपना सप्ताहांत मनाते हैं।

हमने इस वीकएंड में भी कैम्पिंग का प्रोग्राम बनाया था। मर्द यानि रोजर और टॉम आमने ऑफिस से सीधे वहीं चले गए थे। मैं और लेस्ली ३-४ घंटे के बाद वहां के लिए निकलीं। हम दोनों एक ही कार में थे। बियर पीते हुए हम तेजी से कैम्पिंग वाली जगह की ओर जा रहे थे। हम आपस में अपने पतियों के बारे में बातें कर रहे थे कि वे कितने मेहनती हैं। फ़िर हम लोगों की चर्चा सेक्स की होने लगी।

लेस्ली ने अकस्मात् कहा कि मेरे पति को तुम्हारी बड़ी-बड़ी चूचियां बहुत पसंद हैं। और मैं और टॉम कभी-कभी तुम लोगों की कल्पना कर सेक्स करते हैं। मैं सन्न रह गई क्योंकि रोजर भी लेस्ली की गांड की तारीफ रोज करता है। मैंने बोला कि यार ! ऐसा तो हम लोग भी करते हैं, रोजर को तुम्हारी गांड बहुत पसंद है। और मुझे टॉम की बालों भरी छाती आकर्षित करती है।

लेस्ली ने ये सुनकर कहा कि आज क्यों न हम दोनों मर्दों की इच्छा को पूरी कर दें। मैं ये सुनकर रोमांचित हो गई। क्योंकि मैं कितने दिनों से टॉम की बालों भरी छाती पर हाथ फिराते हुए उसके साथ सेक्स के सपने देख रही थी। और रोजर लेस्ली की भारी गांड में लण्ड डालना चाहता था।

फ़िर मैंने कहा कि मैं अगर किसी के साथ अपने पति को बाँटने के बारे में सोच सकती हूँ वो तुम हो।

लेस्ली ने यह सुनकर कहा कि मेरा भी यही ख्याल है। हम रास्ते भर इसी के बारे में बात करते कैंप ग्राउंड पर पहुँच गए। हमने रास्ते में ही ठीक कर लिया था कि टॉम और रोजर को इसके बारे कुछ नहीं बताएँगे। तब तक रात हो गई थी। वहां पहुँच कर हमने देखा कि दोनों ने खाना बना लिया था। और कैंप फायर जला लिया था। हम दोनों ने मिलकर काफ़ी बनाई और हम चारों मिलकर काफ़ी पीने लगे। एक बड़े पार्क में, खुले में, आग के चारों ओर बैठ कर, रात के समय काफ़ी पीने का एक अलग ही रोमांच था।

फ़िर जो रात को होने वाला था उसे सोचकर ही मेरी चूत में खुजली हो रही थी। फ़िर हमने खाना खाया। दोनों मर्दों ने कहा कि अब सोने चलो। दो अलग-अलग कैंप दोनों के लिए लगे थे। उसके बगल में बाथरूम था।

इस पर हमने कहा कि तुम लोग चलो हम थोड़ा नहा कर आते हैं। दोनों अपने-अपने कैंप में चले गए। थोड़ी देर तक बात करने के बाद हम नहाने के लिए बाथरूम में घुसे। एक साथ हम नहा रहे थे। नहाकर कपड़े पहन कर हम बाहर निकले। मैंने नहाने के बाद एक पायजामा और टी-शर्ट पहना था, उसके नीचे मैं पूरी तरह से नंगी थी। फ़िर हम दोनों गले मिली। मैं टॉम यानि लेस्ली के पति के टेंट की ओर बढ़ी और लेस्ली मेरे पति की ओर।

मैंने टॉम के टेंट के पास पहुँच कर लेस्ली की ओर देखा। लेस्ली रोजर के टेंट की जिप खोल रही थी। जिप खोल कर वो भीतर घुस गई और जिप को भीतर से बंद कर लिया। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं अपने कांपते हाथों से टेंट का जिप खोलकर भीतर घुसी। टॉम की पीठ मेरी और थी। मैंने भीतर घुसकर जिप को लगा दिया। टेंट में एक फ्लैश लाइट जल रही थी। मैंने लाइट को बुझा दिया। अब एकदम घुप्प अंधकार था।

टॉम ने मुझे लेस्ली समझकर कहा," कितनी देर लगा दी। मैं तुम्हारा कब से इंतजार कर रहा हूँ।"

मैं कुछ नहीं बोली और उसके पास जाकर उसके कम्बल में घुस गई और अपना एक हाथ उसके लण्ड की और बढा दिया।

हठात टॉम ने पूछा " लेस्ली तुमने शैली का परफ्यूम यूज किया है क्या?''

मैंने कहा," तुमको शैली पसंद है?"

टॉम," शैली !!!! तुम यहाँ ? लेस्ली कहाँ है?"

मैंने कहा," अगर मैं यहाँ हूँ तो लेस्ली कहाँ होगी? सोचो।"

टॉम चिल्ला उठा," ओ माय गाड ! किसका प्लान था ये?"

मैंने कहा," हम दोनों का ! हमने सुना है कि कुछ युगल आपस में बदल कर सेक्स करते हैं। और तुम मेरी बड़ी चुचियों को हसरत से देखते थे और रोजर लेस्ली की बड़ी गांड को निहारता था। तुम दोनों हम दोनों को खुश रखने के लिए कितनी मेहनत करते हो तो हमारा भी तुम्हारी इच्छा पूरी करने का फर्ज बनता है टॉम ! मैं आज पूरी रात तुम्हारे साथ हूँ !"

फ़िर मैंने एक हाथ से टॉम का लण्ड पकड़ लिया। टॉम ने अपने दोनों हाथ से मेरा चेहरा पकड़ कर गहरा चुम्मा लिया। उसने एक हाथ से मेरा टी-शर्ट एक ही झटके में उतार दिया। उसने एक हाथ से मेरी एक चूची पकड़ी और दबाने लगा और मुंह से दूसरे का निप्पल पकड़ कर चूसने लगा। मेरी आँखें उत्तेजना से बंद होने लगी। फ़िर उसने मेरे पायजामे को घुटने तक उतार दिया और अंगुली से मेरे चूत को सहलाने लगा। मैंने अपने पायजामे को पूरी तरह उतार कर कम्बल से बाहर फेंक दिया अब मैं पूरी तरह से नंगी थी।

टॉम ने भी अपने कपड़े उतार दिए। मैंने टॉम से कहा कि मैं तुम्हारा लण्ड चुसना चाहती हूँ। फ़िर मैं नीचे सरक कर लण्ड को मुंह में भर लिया। उसका लंड रोजर से थोड़ा बड़ा ही था। टॉम का एक हाथ मेरी चुचियों पर था और एक हाथ मेरी बुर पर। एक अंगुली से वो मेरी शिश्निका सहला रहा था।

मैंने टॉम का लण्ड पूरी तरह से मुंह में घुसा लिया था। और चूस रही थी। टेंट में घुप्प अंधकार था। फ़िर टॉम मेरे कान में कहा कि मैं अब तुम्हारे बुर का स्वाद लेना चाहूँगा और वह नीचे सरक गया। पहले उसने अपने मुंह को मेरी चिकनी बुर पर फिराया। फ़िर जीभ से सहलाया। हम उस समय ६९ पोजीसन में थे। उसने जीभ को बुर के मुहाने पर रगड़ना शुरू किया।

मैंने उसकी सुविधा के लिए अपनी टांगो को फैला दिया और उसके लण्ड को पूर्ववत चूसती रही। बहुत मजा आ रहा था। उसने अपनी जीभ को अब पूरी तरह से मेरी बुर के भीतर घुसा दिया था। और जीभ से ही चोद रहा था। अंगुली से बुर की चोंच को रगड़ रहा था। मेरी बुर में जैसे आग लग गई थी। मैं उसी समय झड़ गई। ठीक उसी समय वो भी मेरे मुंह में झड़ गया। मैंने उसे कुछ बोला नहीं और वीर्य को बाहर फेंक दिया।

फ़िर टॉम ने कहा," अच्छा ! इस समय लेस्ली और रोजर क्या कर रहे होंगे?"

मैंने कहा," एक ही काम ! चुदाई ! चुदाई और सिर्फ़ चुदाई ! अब मेरी बुर लण्ड से चुदाई मांग रही है, चोद डालो अब मुझे।"

टॉम ने कुछ कहा नहीं और कम्बल में ही मुझको पलट दिया और जीभ को मेरी पीठ पर, हिप्स पर और जांघों पर फिराने लगा।मेरी उत्तेजना भड़कने लगी। वैसे रोजर तो मेरे साथ एनल सेक्स भी करता था कभी-कभी। रोजर को एनल सेक्स बहुत पसंद था।

तभी बगल वाले टेंट से लेस्ली की चीख सुनाई दी।

टॉम ने कहा कि क्या हुआ रोजर ने लेस्ली की बुर फाड़ दी क्या?

मैंने कहा कि नहीं ! रोजर को गांड मारना बहुत पसंद है। उसने लेस्ली की गांड में लण्ड डाला होगा इसीलिए चिल्लाई होगी। फ़िर टॉम ने मुझे पलट दिया और मेरी गांड के नीचे एक तकिया लगा कर मेरी बुर को ऊँचा कर लिया। फ़िर एक झटके में ही अपना लण्ड को घुसा दिया।

मेरी चीख निकल गई। टॉम ने कहा," तुम तो ऐसा कर रही जैसे पहली बार तुम्हारी चुदाई हो रही है ? उधर लेस्ली की गांड को तुम्हारा रोजर फाड़ रहा है।"

मैंने कहा कि दर्द हुआ इसीलिए चिल्लाई। अब तुम जोर से चोद सकते हो।

वो मुझे जोर-जोर से चोदने लगा। मेरी पतली कमर को दोनों हाथों से थोड़ा ऊपर उठाकर जोर से धक्का मर रहा था। मुझे बहुत मजा आ रहा था। फ़िर मैंने कहा कि मेरी चुचियों को भी दबाओ।

वो चूचियां भी दबाने लगा।

थोडी देर इस स्टाइल में चुदवाने के बाद मैंने कहा कि मुझे अब कुतिया बनाकर चोदो।

फ़िर मैं नीचे उतर कर कुतिया स्टाइल में हो गई और वो मुझे पीछे से चोदने लगा। मेरी मुंह से उत्तेजना में आवाज़ें निकल रही थीं आहऽऽऽऽऽऽ आऽऽऽ ऊऽऽऽऽ उओऽऽऽऽ औरऽऽऽऽ जोरऽऽऽऽऽ सेऽऽऽऽऽ मैंऽऽऽऽ स्वर्गऽऽ मेंऽऽ पहुँचऽऽऽ रहीऽऽऽ हूँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ।

अंधेरे में केवल एक ही आवाज आ रही थी - फच्च ऽऽऽऽ फच्चऽऽऽ मेरी सिस्कारियांऽऽऽ और टॉम की हांफने की आवाजें।

माहौल में पूरी तरह से चुदास भरी थी। बगल के टेंट से भी सिसकारियों की आवाजें आ रही थी। टॉम की स्पीड बढती जा रही थी। अब वो झड़ने वाला था। मैं भी झड़ने वाली थी। टॉम ने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया और मेरे हिप्स पर झड़ गया। बहुत मजा आया था।